सुकमा- सुकमा जिले के जगरगुंडा इलाके से आई एक तस्वीर ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जहां बड़े-बड़े मंचों से यह दावा किया जाता है कि स्वास्थ्य सेवाएं गांव-गांव तक पहुंच चुकी हैं, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट नजर आती है। सुकमा जैसे संवेदनशील और दूरस्थ आदिवासी जिले से सामने आई यह घटना न सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती है, बल्कि यह भी बताती है कि 21वीं सदी में भी कई इलाकों में हालात कितने बदतर हैं। कागजों में हाईटेक सिस्टम और आधुनिक सुविधाओं की बात होती है, लेकिन धरातल पर वही सिस्टम आज भी खाट और कंधों के सहारे चलता दिखाई देता है।
ताजा मामला सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड अंतर्गत पंचायत कोंडासावंली के आश्रित ग्राम कर्रेपारा का है, जो जगरगुंडा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां के निवासी कुंजाम हुर्रा ने अज्ञात कारणों से जहरीले पदार्थ का सेवन कर लिया। जहर सेवन के बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। लगातार उल्टी-दस्त और कमजोरी के कारण उनकी स्थिति गंभीर हो गई, जिससे परिजनों और ग्रामीणों में अफरा-तफरी मच गई।
ग्रामीणों ने तत्काल एंबुलेंस सेवा की उम्मीद की, लेकिन समय पर कोई मदद नहीं मिल सकी। उप-स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध होने के बावजूद आपात स्थिति में एंबुलेंस न पहुंच पाना एक बार फिर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी खामी को उजागर करता है। मजबूरी में परिजन और ग्रामीणों ने कुंजाम हुर्रा को कावड़/खाट पर लादकर इलाज के लिए ले जाने का फैसला किया।
कर्रेपारा गांव तक सड़क सुविधा नहीं होने के कारण मरीज को करीब दो किलोमीटर तक खाट पर उठाकर कोंडासावंली तक ले जाना पड़ा। इस दौरान कच्चे और उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए मरीज की हालत और बिगड़ने का खतरा बना रहा। यह दृश्य न सिर्फ दर्दनाक था, बल्कि यह उस सिस्टम पर भी सवाल खड़ा करता है जो हर साल स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बड़े-बड़े दावे करता है।
किसी तरह मरीज को कोंडासावंली पहुंचाया गया, जहां से जगरगुंडा होते हुए एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी। इसके बाद कुंजाम हुर्रा को सुकमा जिला अस्पताल रेफर किया गया। फिलहाल जिला अस्पताल में उनका इलाज जारी है और चिकित्सकों की निगरानी में उन्हें रखा गया है। डॉक्टरों के अनुसार समय पर इलाज मिलना बेहद जरूरी था, अन्यथा जान का खतरा भी हो सकता था।
यह पूरी घटना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि सुकमा जैसे दूरस्थ इलाकों में आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं और आपात सेवाएं कितनी कमजोर हैं। सड़क, एंबुलेंस और त्वरित चिकित्सा सहायता की कमी ग्रामीणों को जान जोखिम में डालने पर मजबूर कर रही है। सवाल यह है कि आखिर कब तक आदिवासी अंचलों के लोग ऐसे हालात में इलाज के लिए संघर्ष करते रहेंगे और कब सरकारी दावे जमीनी हकीकत में तब्दील होंगे।










