धरमजयगढ़। कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत उस समय बेनकाब हो गई, जब धरमजयगढ़ विकासखंड के पारेमेर पंचायत अंतर्गत फिटिंगपारा में संचालित लइका घर की स्थिति सामने आई। पारस स्वयंसेवी संस्था द्वारा संचालित इस केंद्र में नन्हे बच्चों के पोषण और देखभाल के नाम पर खुला खिलवाड़ किया जा रहा है।
लइका घर का उद्देश्य कामकाजी महिलाओं के बच्चों को सुरक्षित माहौल, संतुलित आहार और बेहतर देखभाल देना है, ताकि उनका शारीरिक और मानसिक विकास सुनिश्चित हो सके। लेकिन मौके पर जो तस्वीर सामने आई, वह इन उद्देश्यों पर करारा तमाचा है। बच्चों को जमीन पर मिट्टी में बैठाकर खाना खिलाया जा रहा है, न साफ-सुथरे इंतजाम, न बुनियादी सुविधाएँ। सोने के लिए जमीन पर चटाई डाल दी जाती है—न खाट, न बिस्तर।
मौके पर सुपरवाइजर और रसोईया मौजूद थे। दावा किया गया कि बच्चों को नियमित रूप से पौष्टिक भोजन, अंडा और सब्जी दी जाती है। लेकिन सच्चाई कैमरे में कैद हो गई। बच्चों की थाली में परोसी गई खिचड़ी में सिर्फ दाल और चावल थे—न हरी सब्जी, न पोषण का कोई ठोस आधार। हैरानी की बात यह रही कि खिचड़ी में मक्खियाँ तक नजर आईं। सवाल पूछने पर जवाब मिला—“सब्जी डाली थी, ज्यादा पक गई इसलिए दिख नहीं रही।” यह जवाब न केवल हास्यास्पद है, बल्कि नन्हे बच्चों के स्वास्थ्य के साथ किया गया मजाक भी।
जब हरी सब्जी की अनुपलब्धता पर सीधा सवाल किया गया, तो कहा गया—“आज ही खत्म हो गई है।” यह ‘आज’ कब से चल रहा है, इसका जवाब किसी के पास नहीं। साफ है कि कागजों में यह लइका घर आदर्श मॉडल है, लेकिन जमीन पर उपेक्षा और लापरवाही की मिसाल बन चुका है।
विडंबना यह है कि अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की फंडिंग का हवाला देकर जिम्मेदारियां टाली जा रही हैं। गरीब मजदूर परिवारों के बच्चों को ढाल बनाकर केवल संस्थाओं का नाम चमकाया जा रहा है। न निगरानी, न जवाबदेही—सिर्फ दिखावा।
यह मामला सिर्फ एक लइका घर तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जो मासूम बच्चों के निवाले तक में भ्रष्टाचार को घुसने देती है। सवाल यह है कि क्या कुपोषण से लड़ाई ऐसे ही लड़ी जाएगी? क्या मासूमों की थाली में सब्जी की जगह बहाने परोसे जाते रहेंगे?









