August 2, 2026

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इनर व्हील क्लब ऑफ रायगढ़ सेंट्रल ने उत्साहपूर्वक मनाया फ्रेंडशिप डे रायगढ़ पुलिस को तमनार के चर्चित दोहरे हत्याकांड में मिली महत्वपूर्ण सफलता , चार आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा 20 साल के संघर्ष का असर! पीडब्ल्यूडी के आश्वासन के बाद खुला चक्का जाम, 15 अगस्त तक सड़क को चलने योग्य बनाने का वादा स्मार्ट मीटर हटाओ” अभियान का आगाज़, उपभोक्ताओं का फूटा आक्रोश – “यह स्मार्ट नहीं, बिजली बिल की लूट का मीटर है” महलोई में ग्रामीण पर हत्या की नीयत से टंगिया से वार, आरोपी को पुलिस ने चंद घंटों में किया गिरफ्तार, पत्नी के लापता होने के शक पर आरोपी ने बुजुर्ग पर टंगिया से किया था जानलेवा हमला सांप के काटने से दो मौत, एक का इलाज जारी, बीती रात की घटना, परिजनों में पसरा मातम
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शैलचित्रों व प्रागैतिहासिक संस्कृति की अमूल्य धरोहर को संरक्षित व विकसित करने की जरूरत- गणेश कछवाहा

रायगढ़। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले रायगढ़ की पहचान केवल औद्योगिक नगर अथवा संगीत एवं कला केंद्र के रूप में ही नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता और पुरातात्विक धरोहरों का भी अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, करमागढ़ तथा अन्य शैलाश्रयों में प्राप्त प्राचीन शैलचित्र मानव इतिहास की उन आरंभिक कलात्मक अभिव्यक्तियों के साक्षी हैं, जिन्होंने हजारों वर्ष पूर्व मानव जीवन, संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों को पत्थरों पर अंकित किया।
भारत में प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की खोज का इतिहास जब लिखा जाता है, तब रायगढ़ का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। सिंघनपुर शैलाश्रय की खोज बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बंगाल-नागपुर रेलवे के अधिकारी सी. डब्ल्यू. एंडरसन द्वारा की गई थी। कहा जाता है कि वर्ष 1910-12 के आसपास उन्होंने इस क्षेत्र में भ्रमण के दौरान इन चित्रित गुफाओं को देखा और इसकी जानकारी विद्वानों तक पहुंचाई। बाद में प्रसिद्ध कला इतिहासकार पर्सी ब्राउन तथा अन्य पुरातत्वविदों ने इन शैलचित्रों का अध्ययन किया।रायगढ़ शैलचित्रों पर बाद में कई विद्वानों ने कार्य किया, जिनमें कृपर्सी ब्राउन,सर हेनरी हडसन हडवे,व्ही. स्मिथ,अमरनाथ दत्त,पं.लोचन प्रसाद पांडेय विशेष उल्लेखनीय हैं। इसके उपरांत रायगढ़ क्षेत्र विश्व के पुरातात्विक मानचित्र पर स्थापित हो गया।
सिंघनपुर के शैलचित्रों में आदिम मानव जीवन की विविध झलकियां दिखाई देती हैं। लाल, गेरुए और भूरे रंगों से बनाए गए इन चित्रों में शिकार करते मानव, नृत्य दृश्य, पशु-पक्षी, वृक्ष, ज्यामितीय आकृतियां तथा सामूहिक गतिविधियां अंकित हैं। ये चित्र केवल कला नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक जीवन, जीवन संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के जीवंत दस्तावेज हैं। विशेषज्ञ इन्हें हजारों वर्ष प्राचीन मानते हैं।
रायगढ़ का कबरा पहाड़ भी प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां प्राप्त चित्रों में मानव और प्रकृति के गहरे संबंधों का चित्रण मिलता है। हिरण, बैल, मोर, वन्यजीव तथा सामूहिक शिकार के दृश्य उस समय के जीवन को समझने में सहायता करते हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह क्षेत्र आदिम मानवों के निवास और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा होगा।
सिंघनपुर और कबरा पहाड़ की खोज के बाद अमरनाथ दत्त सहित अनेक पुरातत्वविदों ने रायगढ़ क्षेत्र में व्यापक सर्वेक्षण किया। इस दौरान करमागढ़, ओंगना, पोटिया, बसनाझर, टिमरलगा, गाताडीह आदि अनेक शैलाश्रयों की जानकारी सामने आई। इन स्थलों से यह प्रमाणित होता है कि रायगढ़ अंचल प्राचीन मानव सभ्यता की निरंतर गतिविधियों का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार रायगढ़ के ये शैलचित्र केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक विरासत हैं। इन्हें “छत्तीसगढ़ का भीमबेटका” भी कहा जाता है। मध्यप्रदेश के भीमबेटका की तरह यहां भी मानव सभ्यता के आदिकालीन जीवन के महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। दुर्भाग्य से आज भी इन स्थलों के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हो पाया है।
वर्तमान समय में आवश्यकता इस बात की है कि इन शैलचित्र स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के साथ-साथ इनके संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। यदि पर्यटन, शोध और सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से इन स्थलों का समुचित विकास किया जाए, तो रायगढ़ विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्र के रूप में स्थापित हो सकता है।
रायगढ़ की यह धरोहर केवल पत्थरों पर बने चित्र नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता की आरंभिक चेतना, कला और संस्कृति की अमर गाथाएं हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

Sailaab News
Author: Sailaab News

Owner name : ajay kumar khatri

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