रायगढ – जिले में सड़क सुरक्षा के सरकारी दावे सिर्फ कागजों और फाइलों तक सिमट कर रह गए हैं। घरघोड़ा क्षेत्र में TRN एनर्जी पावर लिमिटेड से निकलने वाला हजारों टन फ्लाई ऐश (राख) आज आम जनता के लिए काल बन चुका है। नियमों को ठेंगा दिखाकर सड़कों पर दौड़ते ओवरलोड डंपर न सिर्फ पर्यावरण को धुआं-धुआं कर रहे हैं, बल्कि राहगीरों की जिंदगी से भी सरेआम खिलवाड़ कर रहे हैं।
ओवरलोडिंग और रफ्तार – डंपर नहीं, ‘यमराज’ के वाहन
घरघोड़ा क्षेत्र की सड़कों पर TRN प्लांट से निकलने वाले डंपर क्षमता से कई गुना अधिक वजन लेकर ‘फर्राटे’ भर रहे हैं। आलम यह है कि ओवरलोड होने के कारण ये डंपर सड़कों पर इस कदर लहराते हैं कि छोटे वाहन चालक और राहगीर अपनी जान बचाने के लिए किनारे खड़े होने को मजबूर हो जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये डंपर सड़क पर चलते हुए नहीं, बल्कि ‘हिलोरे’ मारते हुए मौत की तरह दिखाई देते हैं।
जहरीली धूल ने किया जीना हुआ मुहाल
सिर्फ एक्सीडेंट का खतरा ही नहीं, बल्कि मुनाफे के लालच में इन डंपरों से गिरने वाली राख ने पूरे क्षेत्र को ‘डस्ट ज़ोन’ बना दिया है।
उड़ती राख ने सीधे स्वस्थ पर हमला करते हुए लोगों की आंखों में जलन और सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं। वही सड़कों पर जमी राख की परत के कारण दोपहिया वाहन चालक रोजाना गिरकर घायल हो रहे हैं।
कंपनी प्रबंधन ने प्रशासन आँखों में धूल झोंकने के लिए खराब तिरपाल लगाकर परिवहन कर पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
बड़ा सवाल: आखिर कार्रवाई से क्यों कतरा रहे जिम्मेदार?
हैरानी की बात यह है कि घरघोड़ा क्षेत्र में मौत का यह नंगा नाच प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग और पर्यावरण विभाग की नाक के नीचे चल रहा है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
क्या जिला प्रशासन किसी बड़े और भीषण सड़क हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या उद्योगपतियों का रसूख नियमों से ऊपर हो गया है? या फिर प्रशासन इन जैसे उधगो के सामने बेबस हो गया है।
बार-बार शिकायतों के बाद भी डंपरों की जब्ती और भारी जुर्माने की कार्रवाई क्यों नहीं हो रही ?
TRN एनर्जी और डंपर संचालकों की जुगलबंदी ने घरघोड़ा की सड़कों को असुरक्षित बना दिया है। यदि समय रहते इन ‘सफेद पाउडर’ ढोने वाले डंपरों पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले समय में इसकी भारी कीमत आम जनता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी। अब देखना यह है कि प्रशासन अपनी ‘कुंभकर्णी नींद’ से कब जागता है।









