October 26, 2026

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कर्मागढ़ में आस्था का सैलाब! 15 हजार लोगों की भीड़, सैकड़ों बकरों की बलि… सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में रियासतकालीन से चली आ रही परम्परा आज भी कर्मागढ़ के मानकेश्वरी मंदिर में जारी है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां सैकड़ों बकरों की बलि दी जाती है। इस दौरान यहां हजारों की भीड़ उमड़ती है। इसी क्रम में आज सुबह से देर शाम तक सैकड़ों बकरो की बलि दी गई। रात में यहां कई और आयोजन होंगे।

 

रायगढ़ जिला मुख्यालय से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर ओड़िसा सीमा से लगे कर्मागढ़ गांव जो कि जंगलों से घिरा हुआ है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर आज सुबह से यहां 10 से 15 हजार की भीड़ उमड़ी। इस दौरान यहां बलि प्रथा चली आ रही है और आज भी सैकड़ों बकरो की बलि दी गई। सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार आज शरद पूर्णिमा के दिन आयोजित पूजा अर्चना के दौरान बैगा के शरीर में मां मानकेशरी देवी का प्रभाव हुआ जो एक एक बकरो की बली को ग्रहण करती रही। कहा जाता है की मंदिर में रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी मां मानकेश्वरी देवी आज भी अपने चैतन्य रुप में विराजमान है, जहां माता समय-समय पर अपने भक्तों को अपनी शक्ति अवगत कराती है।

हर साल बढ़ रही लोगो की भारी भीड़
शरद पूर्णिमा के अवसर पर रविवार की सुबह से ही कर्मागढ़ गाँव में लोगों की भारी भीड़ रही, जहां कई लोग दूर दराज से मन्नते पूरी होने के बाद बकरा लेकर मंदिर परिसर पहुंचे थे तो सैकड़ो की संख्या में अन्य लोग भी मन्नत मांगने माता के दरबार में पहुंचे थे। पिछले साल की तुलना में इस बार और अधिक भीड़ देखा गया। हर साल यहां पहले की अपेक्षा भीड़ बढ़ते जा रही है। यहां की व्यवस्था सम्हालने रायगढ़ पुलिस के अलावा गांव के युवा पूरी एकजुटता के साथ अपनी जिम्मेदारी संभालते नजर आए। हजारों की भीड़ को यहां के युवा सुबह से लेकर देर रात तक संभालते हैं, जिससे लोगों को जाम की स्थिति से नहीं गुजरना पड़ता।

हर साल दी जाती है सैकड़ों बकरों की बलि
मानकेश्वरी देवी मंदिर के सदस्य युधिष्ठिर यादव ने बताया कि मां मानकेश्वरी देवी बैगा के ऊपर सवार होती है और जो झंडा लेकर बैगा के पीछे चलता है उसके ऊपर भीमसेन सवार होता है। हर साल शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशेष पूजा अर्चना होती है, जिसमें शामिल होने रायगढ़ के अलावा पड़ोसी राज्य ओड़िशा से भी भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं। उन्होंने बताया कि बाल बच्चा नहीं होने या किसी तरह की बीमारी होने पर यहां मन्नत मांगते हैं, मन्नत पूरी होने के बाद आज के दिन यहां बकरा लेकर पहुंचते हैं और बलि दी जाती है, आज 10 से 15 हजार भीड़ के बीच देर शाम तक सैकड़ों बकरो की बलि दी गई।

अंगूठी की है अनोखी कहानी
गांव के तेजराम सिदार ने बताया कि यह मंदिर पूरे क्षेत्र में विख्यात है। रायगढ़ क राज परिवार के द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गई थी। तब से यह परंपरा चली आ रही है। गांव के लोगों ने बताया कि बलि पूजा से पूर्व विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की जाती है और निशा पूजन के दौरान राजपरिवार से बैगा को एक अंगूठी पहनाई जाती है। वह अंगूठी इतनी ढीली होती है कि वह बैगा अंगुली के नाप में नहीं आती, लेकिन बलपूजा के दौरान वह अंगूठी बैगा के हाथों में इस कदर कस जाती है कि जैसे वह अंगूठी उन्हीं के नाप की बनाई गई हो। इससे पता चलता है कि माता का वास बैगा के शरीर में हो गया है।

जानिए यहां के इतिहास के बारे में
गांव के बुजुर्ग बताते है कि लगभग 1700 ईसवी में हिमगिरि (ओड़िसा) रियासत का राजा जो युद्ध में पराजित हो गया था, जिसके बाद उसे जंजीरों में बांधकर जंगल में छोड़ दिया गया। जंजीरों में जकड़ा राजा भटकते हुए कर्मागढ़ में पहुंचा, जहां उन्हें मां मानकेश्वरी देवी ने दर्शन देकर बंधन मुक्त किया। इसी तरह सन 1780 में एक घटना हुई। जब ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज ने कठोर लगान वसूलने के लिए रायगढ़ और हिमगिरि पर हमला कर दिया था। इस दौरान युद्ध कर्मागढ के जंगली मैदान पर हुआ था। इसी दौरान मधुमक्खियों के अलावा जंगली कीटों ने अंग्रेजो पर हमला कर दिया। जिसमें अंग्रेज पराजित होकर वापस लौट गए और उन्होंने भविष्य में रायगढ़ स्टेट को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

Sailaab News
Author: Sailaab News

Owner name : ajay kumar khatri

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